लहसुनिया, जिसे संस्कृत में 'वैदूर्य' भी कहा जाता है, एक अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमयी रत्न है। अपनी सतह पर मौजूद एक विशेष चमकती हुई रेखा के कारण, जो बिल्ली की आँख (Cat's Eye) जैसी प्रतीत होती है, इसे 'कैट्स आई' कहा जाता है। यह मुख्य रूप से 'क्राइसबेरेल' (Chrysoberyl) खनिज परिवार का पत्थर है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, लहसुनिया रत्न का स्वामी ग्रह केतु (Ketu) है। केतु एक छाया ग्रह है, जो अध्यात्म, मोक्ष, अचानक होने वाली घटनाओं और तकनीकी ज्ञान का कारक माना जाता है।
अचानक धन लाभ: यह रत्न शेयर बाजार, लॉटरी या आकस्मिक धन प्राप्ति में सहायक माना जाता है।
नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा: यह बुरी नजर, टोने-टोटके और प्रेत-बाधाओं से रक्षा करता है।
मानसिक शांति: यह तनाव, अवसाद, भ्रम और डर को दूर कर मन को स्पष्टता प्रदान करता है।
स्वास्थ्य: यह पाचन तंत्र, नेत्र रोग और जोड़ों के दर्द (Arthritis) जैसी समस्याओं में लाभ पहुंचा सकता है।
आध्यात्मिक उन्नति: यह जातक को ध्यान और अध्यात्म की ओर प्रेरित करता है।
कुंडली विश्लेषण के अनुसार, इसे तब पहना जाता है जब:
केतु कुंडली में कमजोर हो या अशुभ प्रभाव दे रहा हो।
केतु की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो।
अचानक जीवन में रुकावटें, डर या मानसिक उलझनें आ रही हों।
सामान्यतः इसे मेष, वृषभ, मिथुन, तुला, मकर और कुंभ राशि के जातकों के लिए शुभ माना जाता है (हालांकि यह पूर्णतः कुंडली की स्थिति पर निर्भर करता है)।
धातु: इसे चांदी या अष्टधातु की अंगूठी में धारण करना सबसे उत्तम माना जाता है।
उंगली: इसे दाएं हाथ की मध्यमा (Middle Finger) या अनामिका (Ring Finger) में पहनना शुभ होता है।
दिन: इसे शनिवार या मंगलवार के दिन, केतु के नक्षत्र या शुभ मुहूर्त में धारण करना चाहिए।
रत्न को धारण करने से पहले शुद्ध करना आवश्यक है:
शुद्धिकरण: रत्न को गंगाजल और कच्चे दूध के मिश्रण में कुछ समय के लिए रखें।
सक्रियण: धारण करने से पहले इसे केतु के बीज मंत्र "ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः" का 108 बार जाप करके अभिमंत्रित करें।
विधि: इसे धारण करने के बाद केतु से संबंधित वस्तुओं (जैसे काले तिल या कंबल) का दान करना लाभकारी होता है।
लहसुनिया का उत्पादन मुख्य रूप से श्रीलंका (सीलोन) में होता है, जिसे सर्वोत्तम गुणवत्ता वाला माना जाता है। इसके अलावा, यह भारत, ब्राजील और अमेरिका में भी पाया जाता है।
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सूर्य कान्त द्विवेदी:
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