यह मंत्र रोगी की चिकित्सा करते समय साधक (चिकित्सक/तांत्रिक) की स्वयं के शरीर की नकारात्मक ऊर्जाओं, भूत-प्रेत बाधाओं और रोग के दुष्प्रभावों से रक्षा करने के लिए अत्यंत अचूक और शक्तिशाली तांत्रिक विधान है।
इस प्रयोग को प्रभावी बनाने हेतु निम्नलिखित चरणों का सावधानीपूर्वक पालन करें:
1. कण्ठस्थीकरण / Memorization: किसी भी शुभ मुहूर्त में इस मंत्र का 108 बार पाठ करके इसे सिद्ध कर लें।
2. चिकित्सा से पूर्व / Before Treatment: रोगी की चिकित्सा प्रारंभ करने से ठीक पहले इस मंत्र का 3 या 7 बार शुद्ध पाठ करें।
3. शरीर बन्धन / Sharir Bandhan (Body Binding): मंत्र पाठ के पश्चात अपनी हथेलियों पर फूंक मारें और फिर अपने पूरे शरीर पर हाथ फेरें, साथ ही छाती पर भी फूंक मारें। यह आपके शरीर को सुरक्षा कवच में बांध देता है।
4. प्रभाव अवधि / Duration of Effect: यह प्रयोग करने के बाद आपका शरीर 7 दिन और 7 रात तक पूरी तरह सुरक्षित (कीलित) रहता है।
अपने साधना स्थल या कार्यस्थल को पूर्णतः सुरक्षित करने हेतु यह प्रयोग करें:
विधि / Method: किसी भी लोहे की वस्तु (जैसे चाकू, त्रिशूल या लोहे की छड़) पर इस मंत्र का 7 बार जप करके उसे सिद्ध (अभिमंत्रित) कर लें।
घेरा / Protection Circle: उस अभिमंत्रित वस्तु का उपयोग करते हुए अपने चारों ओर एक सुरक्षा रेखा (घेरा) खींच दें।
प्रभाव / Effect: इस अभिमंत्रित घेरे के भीतर कोई भी नकारात्मक या तामसिक शक्ति प्रवेश करने में पूर्णतः असमर्थ होगी।
सुरक्षा कवच: चिकित्सक या साधक को रोगी की नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रभाव से बचाता है।
अभेदता: भूत-प्रेत बाधाओं और टोने-टोटके के दुष्प्रभावों को साधक तक पहुँचने से रोकता है।
आत्मविश्वास: इस कवच के कारण साधक निर्भय होकर कठिन से कठिन रोगी का उपचार करने में सक्षम होता है।
ऊर्जा का संरक्षण: यह आपकी व्यक्तिगत ऊर्जा को व्यय होने से बचाता है और आपको रोगमुक्त रखता है।
साधक हेतु विशेष निर्देश: "गलत अभ्यास से बेहतर है सही मार्गदर्शन। साधना पथ पर सुरक्षित और निर्भय होकर आगे बढ़ें।"
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