यह प्रयोग उन लोगों के लिए वर्णित है जो किसी अज्ञात नकारात्मक प्रभाव, ऊपरी बाधा या कुफरी कलाम से पीड़ित महसूस करते हैं। इस विधि की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता है, क्योंकि इसे किसी बाहरी गुरु की उपस्थिति के बिना भी पूर्ण एकाग्रता से किया जा सकता है।
नियम: इस मंत्र को किसी विशेष गुरु दीक्षा की आवश्यकता नहीं बताई गई है। इसे केवल शनिवार या मंगलवार के दिन पूर्ण एकाग्रता के साथ कंठस्थ (याद) करना होता है।
उद्देश्य: यह मंत्र जादू-टोना, नकारात्मक शक्तियों और किसी भी प्रकार के ऊपरी साये (जिन्न-परी आदि) के प्रभाव को नष्ट करने के लिए प्रभावशाली माना गया है।
रोगी को प्रभावमुक्त करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करना होता है:
जल का अभिमंत्रण: किसी साफ कुएं के जल अथवा वर्षा के शुद्ध जल को एक पात्र में लें। इस पर मुख्य मंत्र का 7 बार पाठ करें और प्रत्येक बार मंत्र के अंत में जल पर 'फूँक' (दम) मारें।
प्रयोग: इस अभिमंत्रित (सिद्ध) जल का उपयोग रोगी पर निम्न प्रकार से करें:
सेवन: रोगी को यह जल 7 से 21 दिनों तक लगातार पिलाएं।
स्नान: रोगी को इसी अभिमंत्रित जल से स्नान कराएं।
ध्यान दें: मंत्र में आए 'अमुकेर' शब्द के स्थान पर पीड़ित व्यक्ति का स्पष्ट नाम लेना अनिवार्य है।
तंत्र साधना एक सूक्ष्म और अनुशासित मार्ग है। इसकी सफलता मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करती है:
शुद्ध उच्चारण: मंत्रों के शब्दों का सटीक उच्चारण ही उस ऊर्जा को सक्रिय करता है।
एकाग्रता: प्रयोग के दौरान साधक का मन पूरी तरह से साध्य (रोगी) पर केंद्रित होना चाहिए।
महत्वपूर्ण सूचना एवं सावधानी:
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह जानकारी केवल पारंपरिक तंत्र ग्रंथों के अध्ययन और शोध हेतु है। किसी भी शारीरिक या मानसिक बीमारी के लिए अंधविश्वास पर निर्भर रहने के बजाय योग्य चिकित्सक या मनोरोग विशेषज्ञ (Psychiatrist) से परामर्श लेना ही बुद्धिमानी है।
नैतिक जिम्मेदारी: मंत्र साधना का उद्देश्य सदैव जनकल्याण होना चाहिए। किसी को डराना या मानसिक रूप से प्रभावित करना अनैतिक है।
भ्रम से बचाव: अक्सर लोग मानसिक तनाव या स्वास्थ्य समस्याओं को 'ऊपरी हवा' या 'जादू-टोना' समझ लेते हैं। ऐसी स्थितियों में उचित चिकित्सा उपचार को कभी भी अनदेखा न करें।
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