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ॐ अग्नि शामक स्वयं सिद्ध बंगाली मंत्र (विस्तृत अध्ययन)
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अग्नि शामक स्वयं सिद्ध बंगाली मंत्र (विस्तृत अध्ययन)

प्राचीन लोक-तंत्र एवं कामरुपी विद्या का एक दुर्लभ प्रयोग

यह विवरण प्राचीन भारतीय लोक-विज्ञान और बंगाली लोक-तंत्र (कामरुपी विद्या) के अंतर्गत आने वाले अग्नि शामक मंत्र की सैद्धांतिक और व्यावहारिक समझ के लिए तैयार किया गया है।

1. मूल मंत्र एवं सटीक उच्चारण विधि

मंत्र की प्रभावशीलता उसकी शुद्धता में निहित है। इसका उच्चारण इसी प्रकार करें:

"अग्नि भारा, ब्रह्मस्य उदरे अग्नि नबत्ते जा स्वाहा। आं रंग ह्रींग फट स्वाहा॥ नबत्ते जा स्वाहा, नबत्ते जा स्वाहा। कार आग्गे — कांउरेर का मक्षे शयेर आग्गे। कार आग्गे — हाड़र झ चण्डीर आग्गे॥"

2. मंत्र का विस्तृत अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र में संस्कृत के वैदिक शब्दों और प्राचीन बंगाली लोक-भाषा (कामरुपी शैली) का सुंदर मिश्रण है:

  • अग्नि भारा: अग्नि के बढ़ते वेग या भार को रोकना और उसे नियंत्रण में लेना।

  • ब्रह्मस्य उदरे अग्नि नबत्ते जा स्वाहा: सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के उदर में स्थित वैश्वानर अग्नि के समान यह लौकिक अग्नि भी शांत हो जाए।

  • आं रंग ह्रींग फट स्वाहा: ये तांत्रिक 'बीज मंत्र' हैं, जो मानसिक ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित कर उसे तीव्र गति से जागृत करते हैं।

  • नबत्ते जा स्वाहा: बंगाली शब्द 'नबत्ते' का अर्थ है 'बुझना'। यह अग्नि को पूरी तरह शांत होने का आदेश है।

  • आज्ञा का स्रोत: मंत्र की अंतिम पंक्तियाँ तंत्र के उद्गम स्थल 'कामरूप-कामाख्या' और प्राचीन 'हाड़ी संप्रदाय' की लोक-देवी 'चंडी' की आज्ञा (आण) का आह्वान करती हैं, जो मंत्र को बाध्यकारी शक्ति प्रदान करती हैं।

3. विस्तृत विधि-विधान और व्यावहारिक निर्देश

यह एक 'स्वयं सिद्ध' मंत्र है, जिसका अर्थ है कि इसे सिद्ध करने के लिए लाखों जापों की आवश्यकता नहीं होती; यह मंत्र लोक-परंपरा में पहले से ही जागृत माना जाता है।

प्रयोग की चरणबद्ध विधि (Step-by-Step Procedure):

  1. दृष्टि एकाग्रता (Focus): जहाँ अग्नि प्रज्वलित हो, उस ओर अपनी मानसिक चेतना और दृष्टि (नज़र) को एकाग्र करें। भय को त्याग कर मन को पूर्णतः स्थिर रखें।

  2. पाठ संख्या (Repetition): अग्नि की ओर देखते हुए इस मंत्र का स्पष्ट और दृढ़ स्वर में 3 (तीन) बार पाठ करें।

  3. क्रिया (Action): लोक-परंपरा के अनुसार, मंत्र का प्रत्येक पाठ पूरा करने के बाद अग्नि की दिशा में फूँक (दम) मारें अथवा जल के छींटे दें। माना जाता है कि जल की बूंदें मंत्र की शक्ति से अभिमंत्रित होकर अग्नि के वेग को तत्काल कम कर देती हैं।

विशेष नोट: यह विद्या पारंपारिक बंगाली लोक-तंत्र की पहचान है, जहाँ प्राचीन सिद्धों और लोक-देवियों की 'आण' देकर शक्तियों को जाग्रत किया जाता था। इसका उपयोग केवल आपातकालीन स्थितियों में लोक-कल्याण हेतु ही किया जाना चाहिए।

अग्नि शामक स्वयं सिद्ध बंगाली मंत्र (विस्तृत अध्ययन)

प्राचीन लोक-तंत्र एवं कामरुपी विद्या का एक दुर्लभ प्रयोग

यह विवरण प्राचीन भारतीय लोक-विज्ञान और बंगाली लोक-तंत्र (कामरुपी विद्या) के अंतर्गत आने वाले अग्नि शामक मंत्र की सैद्धांतिक और व्यावहारिक समझ के लिए तैयार किया गया है।

1. मूल मंत्र एवं सटीक उच्चारण विधि

मंत्र की प्रभावशीलता उसकी शुद्धता में निहित है। इसका उच्चारण इसी प्रकार करें:

"अग्नि भारा, ब्रह्मस्य उदरे अग्नि नबत्ते जा स्वाहा। आं रंग ह्रींग फट स्वाहा॥ नबत्ते जा स्वाहा, नबत्ते जा स्वाहा। कार आग्गे — कांउरेर का मक्षे शयेर आग्गे। कार आग्गे — हाड़र झ चण्डीर आग्गे॥"

2. मंत्र का विस्तृत अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र में संस्कृत के वैदिक शब्दों और प्राचीन बंगाली लोक-भाषा (कामरुपी शैली) का सुंदर मिश्रण है:

  • अग्नि भारा: अग्नि के बढ़ते वेग या भार को रोकना और उसे नियंत्रण में लेना।

  • ब्रह्मस्य उदरे अग्नि नबत्ते जा स्वाहा: सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के उदर में स्थित वैश्वानर अग्नि के समान यह लौकिक अग्नि भी शांत हो जाए।

  • आं रंग ह्रींग फट स्वाहा: ये तांत्रिक 'बीज मंत्र' हैं, जो मानसिक ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित कर उसे तीव्र गति से जागृत करते हैं।

  • नबत्ते जा स्वाहा: बंगाली शब्द 'नबत्ते' का अर्थ है 'बुझना'। यह अग्नि को पूरी तरह शांत होने का आदेश है।

  • आज्ञा का स्रोत: मंत्र की अंतिम पंक्तियाँ तंत्र के उद्गम स्थल 'कामरूप-कामाख्या' और प्राचीन 'हाड़ी संप्रदाय' की लोक-देवी 'चंडी' की आज्ञा (आण) का आह्वान करती हैं, जो मंत्र को बाध्यकारी शक्ति प्रदान करती हैं।

3. विस्तृत विधि-विधान और व्यावहारिक निर्देश

यह एक 'स्वयं सिद्ध' मंत्र है, जिसका अर्थ है कि इसे सिद्ध करने के लिए लाखों जापों की आवश्यकता नहीं होती; यह मंत्र लोक-परंपरा में पहले से ही जागृत माना जाता है।

प्रयोग की चरणबद्ध विधि (Step-by-Step Procedure):

  1. दृष्टि एकाग्रता (Focus): जहाँ अग्नि प्रज्वलित हो, उस ओर अपनी मानसिक चेतना और दृष्टि (नज़र) को एकाग्र करें। भय को त्याग कर मन को पूर्णतः स्थिर रखें।

  2. पाठ संख्या (Repetition): अग्नि की ओर देखते हुए इस मंत्र का स्पष्ट और दृढ़ स्वर में 3 (तीन) बार पाठ करें।

  3. क्रिया (Action): लोक-परंपरा के अनुसार, मंत्र का प्रत्येक पाठ पूरा करने के बाद अग्नि की दिशा में फूँक (दम) मारें अथवा जल के छींटे दें। माना जाता है कि जल की बूंदें मंत्र की शक्ति से अभिमंत्रित होकर अग्नि के वेग को तत्काल कम कर देती हैं।

विशेष नोट: यह विद्या पारंपारिक बंगाली लोक-तंत्र की पहचान है, जहाँ प्राचीन सिद्धों और लोक-देवियों की 'आण' देकर शक्तियों को जाग्रत किया जाता था। इसका उपयोग केवल आपातकालीन स्थितियों में लोक-कल्याण हेतु ही किया जाना चाहिए।

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