तंत्र और मंत्र शास्त्र का यह अचूक नियम है कि जब तक किसी मंत्र को 'चैतन्य' (जाग्रत या प्राण-प्रतिष्ठित) नहीं किया जाता, तब तक वह अपना पूर्ण फल प्रदान करने में असमर्थ होता है।
योग्यता और दीक्षा: मंत्र साधना में कदम रखने के लिए साधक का सदाचारी, संयमित और जितेंद्रिय होना अनिवार्य है। सर्वप्रथम किसी योग्य, सदाचारी और तंत्र-मंत्र के ज्ञाता गुरु से शास्त्रोक्त विधि से दीक्षा ग्रहण करें।
लेखन एवं कंठस्थीकरण: गुरु से प्राप्त मंत्र को किसी शुभ तिथि, नक्षत्र और काल (मुहूर्त) में भोजपत्र पर अष्टगंध या गोरोचन की स्याही से लिखें। तत्पश्चात, मंत्र को पूरी तरह से कंठस्थ (बिना देखे, शुद्ध उच्चारण के साथ) याद कर लें।
चैतन्य करने की क्रिया (पुरश्चरण): मंत्र कंठस्थ होने के बाद, गुरु के निर्देशानुसार उस मंत्र का 1,00,000 (एक लाख) बार या गुरु द्वारा निर्दिष्ट संख्या में जप (पुरश्चरण) करें। इस गहन जप प्रक्रिया से ही मंत्र में दिव्य ऊर्जा और चेतना का प्राकट्य होता है।
बिना चैतन्य किए गए मंत्र केवल शब्दों का समूह मात्र होते हैं। केवल इस प्रकार चैतन्य किया गया मंत्र ही प्रयोग करने पर शत-प्रतिशत सफलता और चमत्कारी परिणाम प्रदान करता है।
साधना में उच्चारण की थोड़ी सी भी त्रुटि या विधि-विधान में की गई लापरवाही साधना को निष्फल कर सकती है या इसके विपरीत परिणाम भी दे सकती है। अतः इन सभी मंत्रों और विधानों का प्रयोग पूरे सोच-विचार, शुद्ध अंतःकरण और पूर्ण सावधानी के साथ ही करें।
यदि आपको इन मंत्रों के शुद्ध उच्चारण में, अक्षरों को समझने में या साधना की जटिल विधियों को संपन्न करने में किसी भी प्रकार की शंका, दुविधा या असुविधा महसूस होती है, तो स्वयं के स्तर पर कोई गलत निर्णय न लें।
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