यह अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली शाबर मंत्र माँ अन्नपूर्णा को समर्पित है। इस मंत्र का मुख्य उद्देश्य घर के भण्डार-गृह (रसोई या अन्न भंडार) में बरकत बनाए रखना और कभी भी अन्न-धन की कमी न होने देना है।
ॐ नमः अन्नपूर्णा अन्न पूरे। घृत पूरे गणेश जी। पाती पूरे ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीनों देवतन। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति। श्री गुरु गोरखनाथ की दुहाई। फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा॥
सिद्धि काल: इस मंत्र को किसी भी ग्रहण-काल (चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण) या विशेष पर्व काल (जैसे दीपावली, अक्षय तृतीया आदि) के दौरान अनुष्ठान पूर्वक एक लाख (1,00,000) बार जप कर सिद्ध किया जाता है।
भोग अर्पण: मंत्र सिद्ध होने के पश्चात, भण्डार-गृह की अछूती (शुद्ध और ताज़ी) भोज्य-सामग्रियों में से माँ अन्नपूर्णा का स्मरण व मंत्र जप करते हुए भोग लगाएं।
जल और कलश स्थापना:
भोग का एक हिस्सा कुएं में प्रवाहित करें।
उसी कुएं से साफ कलश में एक हाथ द्वारा जल भरकर लाएं और इसे भण्डार-गृह में स्थापित करें।
कलश के ऊपर आम के पत्ते (आम्र पल्लव) रखें।
इसके बाद माता अन्नपूर्णा और भगवान वरुण की विधि-विधान से पूजा करें।
भोज एवं परम्परा:
पूजा और मंत्र जप के पश्चात ही भोज (भोजन) की शुरुआत करें।
विशेष ध्यान रखें: यदि संभव हो, तो इस भोज में किसी ब्राह्मण (विप्र) को अवश्य आमंत्रित करें और पंगत में सबसे पहले भोजन उन्हीं को परोसें।
इस विधान का पालन करने से माँ अन्नपूर्णा की कृपा सदैव बनी रहती है।
घर के अन्न-भण्डार में कभी भी तंगी या अन्नाभाव का संकट उत्पन्न नहीं होता।
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