यह साधना अत्यंत गुप्त और गंभीर प्रकृति की मानी जाती है। तंत्र विद्या के अनुसर, इस प्रकार की क्रियाओं में नियमों का उल्लंघन साधक के लिए कष्टकारी हो सकता है।
मुहूर्त: इस मंत्र को पूर्णतः सिद्ध करने के लिए अमावस्या या पूर्णिमा की रात्रि का चयन किया जाता है।
साधना प्रक्रिया: इन विशेष तिथियों पर मंत्र को पूरी एकाग्रता के साथ जप कर कंठस्थ (याद) करना होता है।
आवश्यक निर्देश: तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, इस मंत्र को बिना किसी योग्य गुरु या उस्ताद की आज्ञा और मार्गदर्शन के करना वर्जित है। निर्देशों का पालन न करने पर गंभीर व्यक्तिगत संकट या जान-माल की हानि की चेतावनी दी गई है।
यदि मंत्र सिद्ध हो चुका है, तो उसे लागू करने के लिए निम्नलिखित कठोर नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
समय: प्रयोग केवल शनिवार या मंगलवार की रात्रि में ही संभव है।
स्थान: साधक को पूर्ण गोपनीयता के साथ शत्रु (महिला) के निवास स्थान पर जाना होता है।
क्रिया: वहां पहुँचकर पूरी एकाग्रता के साथ 21 बार मंत्र का पाठ करना होता है। मंत्र के प्रत्येक पाठ के बाद एक बार ताली (तुड़ी) बजाने का विधान है।
वापसी का नियम: क्रिया संपन्न करने के उपरांत वापस लौटते समय पीछे मुड़कर देखना पूर्णतः निषेध है। ऐसा माना जाता है कि नियम का पालन न करने पर प्रयोग का प्रतिकूल प्रभाव साधक पर ही पड़ सकता है।
मंत्र साधना एक अत्यंत सूक्ष्म और अनुशासित विज्ञान है। सफलता पूरी तरह से शब्दों के शुद्ध उच्चारण और निर्धारित क्रियाओं के सही निष्पादन पर निर्भर करती है। किसी भी प्रकार की त्रुटि से बचने के लिए छात्रों और साधकों को अत्यंत सतर्कता बरतने का परामर्श दिया गया है।
अति महत्वपूर्ण कानूनी एवं नैतिक चेतावनी: ऊपर दी गई जानकारी केवल तांत्रिक ग्रंथों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अध्ययन के उद्देश्य से है। किसी व्यक्ति के घर में अनधिकृत प्रवेश करना, उन्हें डराना, या उन पर मानसिक दबाव बनाना भारतीय कानून (IPC/BNS) के अंतर्गत गंभीर अपराध है। साथ ही, 'भूत-प्रेत' जैसी मान्यताएं वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं। हम इन क्रियाओं को करने का किसी भी प्रकार से समर्थन नहीं करते हैं। किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत विवाद को सुलझाने के लिए हमेशा कानूनी मार्ग, पुलिस सहायता या आपसी संवाद का ही चयन करें।
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