केतु देव महासाधना: मोक्ष, अध्यात्म और अज्ञात भय से मुक्ति का अनुष्ठान
ज्योतिष शास्त्र में केतु को 'मोक्ष कारक' और आध्यात्मिक उन्नति का ग्रह माना गया है। केतु का प्रभाव जीवन में आकस्मिक परिवर्तनों, वैराग्य और गहरी अंतर्दृष्टि के रूप में दिखाई देता है। यदि आप अज्ञात भय से मुक्ति, चर्म रोगों में शांति या आध्यात्मिक सिद्धि चाहते हैं, तो केतु देव की महासाधना अत्यंत लाभकारी है।
| विवरण | विवरणात्मक जानकारी |
| कुल जाप संख्या | 17,000 मंत्र (कलियुग विधान के अनुसार 68,000 जाप) |
| जाप का समय | देर रात्रि या भोर (सूर्योदय से ठीक पहले) |
| वस्त्र एवं आसन | दोरंगे (Multi-colored) या भूरे रंग के वस्त्र |
| माला | लहसुनिया या रुद्राक्ष की माला |
साधना के दौरान इन मंत्रों का पाठ करें:
ध्यान मंत्र: ओँ केतुर्धूम्रबर्णो द्विभुजो गदापाणिः। दक्षाभयप्रदकरो बरदश्च महाबलः सदा भवतु मे सुखदो बिधाता।।
पूजा मंत्र: ओँ ऐं ह्रीं केतवे नमः।
प्रणाम मंत्र: पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।
आसन और दिशा: साधना हेतु कंबल के आसन का प्रयोग करें। उत्तर या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठना शुभ होता है।
विशेष पूजन विधि: पूजा में कुशा घास और सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य) को अपने सम्मुख रखें। यह विधि केतु की ऊर्जा को संतुलित करने में सहायक है।
जाप संकल्प: कलियुग में पूर्ण फल प्राप्ति हेतु 68,000 मंत्रों का जाप अनुशंसित है। अपनी दिनचर्या के अनुसार इसे प्रतिदिन निर्धारित मालाओं (1, 3 या 5) में विभाजित कर पूर्ण करें।
उच्चारण: मंत्रों के शुद्धिकरण हेतु 'व' को 'ब' और 'श/ष' को 'श' के रूप में उच्चारित करें।
विशेष परामर्श
यदि आप अज्ञात भय, जटिल चर्म रोगों या केतु ग्रह की दशा से उत्पन्न मानसिक असमंजस का सामना कर रहे हैं, तो इन कष्टों के निवारण हेतु सटीक अनुष्ठान आवश्यक हैं। केतु शांति के विशिष्ट उपायों की अधिक जानकारी के लिए हमारे केंद्र के विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य से संपर्क करें।
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