यह मंत्र और इसकी तांत्रिक विधि शरीर से गंभीर ज्वर (बुखार) के वेग और उसके कुप्रभावों को शांत करने के लिए प्रयोग की जाती है।
"ॐ नमश्चतुहस्ताय पावये वज्रसेनापतये। ॐ ज्वर शृणु शृणु छिन्ध छिन्ध ह्रीं स्वाहा। मुञ्च मुञ्च उदरं मुञ्च मुञ्च कटं मुञ्च मुञ्च हस्तौ मुञ्च मुञ्च पादौ मुञ्च मुञ्च सवगात्राण मुञ्च मुञ्च। ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रः फट्। अमुकगोत्रस्य अमुकस्य सवज्वरं नाशाय नाशाय स्वाहा इत-ज्वरदोषशांत मन्त्राः।"
विशेष निर्देश: मंत्र का जप या लेखन करते समय 'अमुकगोत्रस्य' के स्थान पर पीड़ित व्यक्ति के मूल गोत्र का नाम और 'अमुकस्य' के स्थान पर पीड़ित व्यक्ति के नाम का उच्चारण/लेखन करें।
आवश्यक सामग्री: शुद्ध भोजपत्र, आलता (महावर) या गोरोचन की स्याही, अनार की कलम, और लपेटने के लिए लाल रंग का सूती धागा (रक्तवर्ण सूत्र)।
लेखन विधि: सर्वप्रथम साधक स्नान आदि से पवित्र होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठे। पीड़ित व्यक्ति के नाम और गोत्र का मानसिक संकल्प लें और आलता या गोरोचन से अनार की कलम द्वारा उपयुक्त मंत्र को भोजपत्र पर पूर्ण शुद्धता के साथ अंकित करें।
धारण विधि: मंत्र लेखन पूर्ण होने के उपरांत भोजपत्र को सावधानीपूर्वक मोड़ लें। इसके बाद लाल सूती धागे से उसे चारों तरफ से लपेटकर (वेष्टन करके) एक रक्षा कवच या ताबीज का रूप दें। अंत में इस अभिमंत्रित रक्षा सूत्र को पीड़ित रोगी के कंठ (गले) में धारण करवा दें।
इस विधि से गंभीर और असाध्य ज्वर का भी तत्काल शमन होता है और रोगी शीघ्र ही आरोग्य लाभ प्राप्त करता है।
सावधानी: तांत्रिक प्रयोगों में शुद्धता का अत्यधिक महत्व होता है। यदि रोगी की स्थिति अत्यंत गंभीर हो, तो चिकित्सीय परामर्श के साथ-साथ इन आध्यात्मिक उपायों का सहारा लेना श्रेयस्कर होता है। किसी भी प्रकार की शंका होने पर केंद्र के विशेषज्ञों से परामर्श अवश्य लें।
No review given yet!
Fast Delivery all across the country
Safe Payment
7 Days Return Policy
100% Authentic Products