यह प्रयोग भगवान धर्मदेव की न्यायपूर्ण ऊर्जा से प्रेरित है। इसका मुख्य उद्देश्य आत्म-रक्षा, देह-बंधन (शरीर को कीलित करना) और प्रतिकूल परिस्थितियों को नियंत्रित करना है। यह तांत्रिक विधान साधक को धर्म और न्याय के सुरक्षा कवच से आच्छादित करता है।
इस सुरक्षा कवच को सक्रिय करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
तैयारी / Preparation: शुद्ध और पवित्र वस्त्र धारण करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें। पूर्ण एकाग्रता और शांत मन से मंत्र का जाप प्रारंभ करें।
विधि / Ritual Method: पवित्र आसन पर बैठकर कुल 7 बार मंत्र का पाठ करें। मंत्र पाठ के दौरान अपने शरीर के मुख्य अंगों के पास 'चुटकी' बजाते रहें, अथवा प्रत्येक मंत्र की समाप्ति पर अपने शरीर पर 'फूंक' मारें।
विशेष निर्देश / Special Instructions: मंत्र पढ़ते समय बंगाली ध्वनि (उच्चारण) की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि मंत्र की प्रभावशीलता उसके सही उच्चारण में ही निहित है।
अपने निवास या साधना स्थल को नकारात्मक ऊर्जा से बचाने के लिए यह प्रयोग करें:
विधि / Method: किसी भी लोहे की वस्तु पर इस मंत्र का 7 बार जप करके उसे सिद्ध (अभिमंत्रित) कर लें।
घेरा / Protection Circle: उस अभिमंत्रित वस्तु का उपयोग करते हुए अपने चारों ओर एक सुरक्षा रेखा (घेरा) खींच दें।
परम सुरक्षा: यह प्रयोग साधक को हर प्रकार की अनिष्टकारी शक्तियों और अदृश्य बाधाओं से बचाता है।
प्रतिकूलता का नाश: जीवन में आने वाली कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों को बांधने (नियंत्रित करने) में यह मंत्र अत्यंत सहायक है।
नैतिक बल: धर्मदेव की कृपा से साधक के भीतर साहस, धैर्य और न्याय के प्रति अडिग विश्वास का संचार होता है।
अजेय रक्षा कवच: इस मंत्र द्वारा कीलित शरीर पर किसी भी तामसिक प्रयोग का असर नहीं होता।
साधक हेतु विशेष परामर्श: "सही मार्गदर्शन ही साधना की सफलता का आधार है। अपनी ऊर्जा को सदैव धर्म और सत्य के मार्ग पर केंद्रित रखें।"
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