अष्टगंध आठ विशिष्ट सुगंधित और दिव्य पदार्थों का एक पवित्र मिश्रण है, जिसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, यंत्र-लेखन और साधनाओं में किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इसके तीन मुख्य निर्माण विधान हैं:
यह सर्वाधिक प्रचलित और प्रामाणिक विधि है।
घटक: अगर, तगर, गोरोचन, कस्तूरी, चंदन, सिंदूर, लाल चंदन, केशर।
निर्माण विधि: इन आठों सामग्रियों को एकत्र कर एक स्वच्छ खरल में डालें। इसे तब तक घोटें जब तक कि यह यंत्र लिखने हेतु एक बारीक और सुंदर स्याही का रूप न ले ले।
यह विधान विशेष तांत्रिक कार्यों के लिए उपयोगी माना जाता है।
घटक: कपूर, कस्तूरी, केशर, गोरोचन, संगरफ (सिंदूर का एक प्रकार), चंदन, अगर, गेहूंला।
उपयोग: इन सामग्रियों का उचित मिश्रण तैयार कर अष्टगंध के रूप में प्रयोग किया जाता है।
यह विधि धार्मिक अनुष्ठानों और गहन साधनाओं में विशेष रूप से प्रभावी है।
घटक: केशर, कस्तूरी, कपूर, हंगलू, चंदन, लाल चंदन, अगर, तगर।
उपयोग: इन आठों द्रव्यों के परस्पर मिश्रण को अष्टगंध की संज्ञा दी गई है, जो पूजा एवं साधना में प्रयुक्त होती है।
शुद्धता (Purity): अष्टगंध निर्माण के लिए सभी सामग्रियां पूर्णतः शुद्ध और असली होनी चाहिए, क्योंकि इसका उपयोग दिव्य ऊर्जाओं को आकर्षित करने वाले यंत्रों के लेखन में किया जाता है।
पात्र का चयन (Selection of Utensils): निर्माण के लिए हमेशा पत्थर या शुद्ध धातु की स्वच्छ खरल का ही उपयोग करें।
संग्रह (Storage): तैयार अष्टगंध को कांच की छोटी शीशी या मिट्टी के पात्र में सुरक्षित रखें ताकि इसकी सुगंध और प्रभाव बना रहे।
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