प्राचीन तांत्रिक ग्रंथों और गूढ़ लोक-साधना परंपराओं में कई ऐसी विशिष्ट साधनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनका उद्देश्य साधक को असाधारण शारीरिक और आध्यात्मिक क्षमताएं प्रदान करना माना गया है। शीघ्र गमन साधना भी इसी श्रेणी की एक दुर्लभ और परंपरागत साधना मानी जाती है। इसमें किसी भी प्रकार की विधि, अनुष्ठान या मंत्र के प्रयोग को अलग रखकर केवल इसके पारंपरिक महत्व, प्रभाव और लाभों पर दृष्टि डाली जाए, तो इसके निम्नलिखित मुख्य लाभ और प्रभाव वर्णित किए गए हैं:
इस साधना का प्राथमिक और सबसे प्रमुख लाभ साधक की गति (चाल) में अभूतपूर्व तीव्रता आना माना गया है। प्राचीन विवरणों के अनुसार:
साधक बिना किसी भौतिक वाहन के केवल अपने पैरों से अत्यधिक तेज गति से लंबी दूरी तय करने में सक्षम माना जाता है।
यह प्रभाव साधक के शरीर में ऊर्जा, स्फूर्ति और वायु-तत्व की प्रधानता को बढ़ाने के संदर्भ में देखा जाता है, जिससे चलने की सामान्य गति कई गुना बढ़ जाती है।
पारंपरिक ग्रंथों में इस साधना का सबसे बड़ा लाभ यह बताया गया है कि साधक को 'सहस्र योजन' (हजारों किलोमीटर या अत्यधिक लंबी दूरी) पैदल तय करने का शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य प्राप्त होता है।
इसका अर्थ असाधारण सहनशक्ति (Extreme Endurance and Stamina) का विकास है, जहां साधक लगातार बिना रुके या बिना थके निरंतर यात्रा करने में समर्थ समझा जाता है।
यह सामर्थ्य साधक को सामान्य मानवीय शारीरिक सीमाओं से परे जाकर दीर्घ यात्राओं को सुगम बनाने की क्षमता से जोड़कर देखा जाता है।
लंबी दूरी की यात्राओं के दौरान सामान्यतः शरीर में मांसपेशियों की थकान, जोड़ों का दर्द और ऊर्जा का ह्रास होता है। हालांकि, इस साधना के प्रभाव के संदर्भ में यह माना गया है कि:
साधक के पैरों और शरीर में ऐसी स्थिरता और ऊर्जा का संचार होता है जिससे थकान का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है।
अत्यधिक परिश्रम और निरंतर चलने के बावजूद शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है और शिथिलता का अनुभव नहीं होता।
तांत्रिक परंपरा में किसी भी गूढ़ साधना की सिद्धि साधक के भीतर मानसिक दृढ़ता और अनुशासन को बढ़ाती है।
कठिन परिस्थितियों और दुर्गम मार्गों पर निरंतर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक मानसिक एकाग्रता और इच्छाशक्ति का विकास होता है।
यह केवल शारीरिक गति का विषय न होकर साधक के संकल्प और स्नायु तंत्र (nervous stamina) को सुदृढ़ करने के लाभ से भी संबंधित माना जाता है।
प्राचीन काल में जब आवागमन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब जंगलों, पर्वतों और दुर्गम मार्गों को शीघ्रता से पार करने के लिए ऐसी साधनाओं को उपयोगी माना जाता था। मान्यतानुसार, इसके प्रभाव से साधक कठिन भौगोलिक क्षेत्रों और विषम रास्तों को भी सहजता और न्यूनतम समय में पार करने में सक्षम हो जाता है।
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