साधना में सफलता हेतु विधि:-
साधना में सफलता कैसे पाएं:
साधना की बारीकियां समझाने के लिए मेरा खास गहन अध्ययन एवं अनुसंधान आज आपके लिए,,
लेखक: पं. सूर्यकान्त द्विवेदी
साधना केवल मंत्र जपने का नाम नहीं है। यह शरीर, मन, बुद्धि और संकल्प की परीक्षा है। शिष्य को सबसे पहले यही समझाना चाहिए कि साधना में सफलता तीन बातों पर टिकी है: धैर्य, साहस और शरीर का बल। डर साधना का सबसे बड़ा शत्रु है। जो शिष्य डर पर विजय पा लेता है, उसकी आधी साधना पहले ही सफल हो जाती है। इसलिए साधना शुरू करने से पहले शिष्य को खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए, बुरी संगति और बुरी जगहों से बचना चाहिए, कम बोलना चाहिए और अधिकतम मौन रखना चाहिए। साधना के समय किसी बाहरी बात की चिंता मन में नहीं रखनी चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि भोजन में आसक्ति न हो, पर शरीर में बल अवश्य बना रहे।
साधना से पहले का पूजन
किसी भी प्रकार की साधना, चाहे वह सात्विक हो या तामसिक, मुख्य साधना से पहले अपने सभी देवताओं के स्मरण और पूजन से शुरू होनी चाहिए। इसके लिए सभी के नाम से एक-एक बताशा और एक-एक अगरबत्ती अर्पित की जाती है। अगरबत्ती जलाई जाती है और बताशा सामने रखा जाता है। इसके बाद ही मुख्य साधना आरंभ होती है। शिष्य स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहने, आसन पर बैठे और हाथ जोड़कर प्रार्थना करे कि उसकी साधना निर्विघ्न पूरी हो और उसे सभी की आज्ञा और रक्षा प्राप्त हो।
सबसे पहले गुरु का स्मरण करें और "ॐ गुरुभ्यो नमः" कहकर एक बताशा और एक अगरबत्ती अर्पित करें। फिर श्री गणेश जी का स्मरण करें और "ॐ गं गणपतये नमः" कहकर एक बताशा और एक अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद अपने इष्ट देवता का स्मरण करें और "ॐ" के साथ उनका नाम लेकर "नमः" कहें, फिर एक बताशा और एक अगरबत्ती अर्पित करें। इसी क्रम में कुलदेवता या कुलदेवी के लिए "ॐ कुलदेवताभ्यो नमः", ग्राम देवता के लिए "ॐ ग्रामदेवताभ्यो नमः", और जिस स्थान पर साधना कर रहे हैं उस स्थान के देवता के लिए "ॐ स्थानदेवताभ्यो नमः" कहें और हर एक के नाम से एक बताशा और एक अगरबत्ती अर्पित करें। अंत में वास्तु देवता के लिए "ॐ वास्तुपुरुषाय नमः" कहकर एक बताशा और एक अगरबत्ती अर्पित करें। जब यह सब हो जाए, तब गुरु से आज्ञा मांगकर मुख्य साधना का संकल्प लें।
सभी देवताओं के साथ धरती और आकाश को भी प्रणाम करना चाहिए। धरती माता को प्रणाम करते समय "ॐ पृथिव्यै नमः" कहें और भूमि को स्पर्श करके मस्तक से लगाएं। आकाश को प्रणाम करते समय ऊपर की ओर हाथ जोड़कर "ॐ आकाशाय नमः" कहें। मान्यता है कि साधना धरती पर बैठकर और आकाश के नीचे होती है, इसलिए इन दोनों की आज्ञा और आशीर्वाद लेकर ही मुख्य साधना शुरू करनी चाहिए।
तैयारी और सुरक्षा
पूजन के बाद सुरक्षा घेरा बनाया जाता है। यह घेरा जल से लगाया जा सकता है या पीली सरसों से, और साथ में सर्व-बंधन मंत्र का प्रयोग किया जाता है। दीपक के साथ मोमबत्ती भी जलाकर रखें और ऐसी व्यवस्था करें कि दीपक बुझने न पाए, अर्थात तेल पर्याप्त हो और हवा से बचाव हो। जिस देवी, देवता, अप्सरा या शक्ति की साधना कर रहे हैं, उसका यंत्र हल्दी, कुमकुम या चावल से सामने बनाएं और उसका पूजन करें। साधना कभी भी नशे की वस्तु जैसे भांग, शराब या अफीम का सेवन करके न करें। जहां साधना करनी है, वहीं पर सोना भी चाहिए। यदि तामसिक साधना में मांस या मदिरा का भोग लगाना हो तो लगाया जा सकता है, पर साधक स्वयं उसे ग्रहण नहीं करेगा।
साधना करते समय मुख की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। साधना से पहले कई बार कुल्ला करके मुख को शुद्ध कर लेना चाहिए, क्योंकि मुख बहुत अधिक पवित्र रहना चाहिए। जूठे मुख से साधना नहीं की जाती। कुछ विशेष साधनाएं ऐसी अवश्य होती हैं जो जूठे मुख से की जाती हैं, पर बाकी लगभग सभी साधनाएं कई बार कुल्ला करने के बाद ही करनी चाहिए।
जिसके परिवार में किसी का जन्म होने वाला हो, या कोई मृत्यु के निकट हो, उसे साधना नहीं करनी चाहिए। बड़ी साधनाएं सिद्ध होने लगती हैं तो परिवार पर संकट का भ्रम पैदा होता है, इसलिए यह नियम आवश्यक है।
पहले सात्विक साधना, फिर तामसिक
कोई भी खतरनाक तामसिक साधना करने से पहले किसी इष्ट देव की साधना अवश्य कर लेनी चाहिए। काली जी, भैरव जी, या दस महाविद्याओं में से माता बगलामुखी, माता तारा, माता मातंगी या माता छिन्नमस्ता, इनमें से किसी एक के मंत्र का कम से कम सवा लाख जप करना चाहिए। इससे तामसिक साधना में कोई खतरा आए तो वही देवता साधक की रक्षा करते हैं। यदि गुरु के सान्निध्य में साधना हो रही है तो जिम्मेदारी गुरु की होती है और कोई चिंता नहीं रहती। पर जो अपने स्वभाव से साधना करे, उसे पहले सात्विक साधना और सवा लाख मंत्र जप अवश्य कर लेना चाहिए।जिस साधना को कर रहे हैं, उसके मुख्य देवता का मंत्र या नाम भी लेना चाहिए। दस महाविद्या का जप करें तो शंकर जी का कोई भी मंत्र जपें। यक्षिणी की साधना में यक्षराज कुबेर के किसी मंत्र का जप करें। अप्सरा या गंधर्व की साधना में देवराज इंद्र के मंत्र का ध्यान करें। प्रेत योनि की साधना में माता दक्षिण काली का ध्यान करें, या उस श्मशान के देवता का स्मरण करें जहां साधना कर रहे हैं। उनका नाम पता न हो तो भोग लगाकर श्मशान के देवता का स्मरण करके साधना करें। जप थोड़ा ही हो, पर हो जरूर।
मंत्र जप का नियम
मंत्र जप सदैव बढ़ते क्रम में करना चाहिए, घटते क्रम में कभी नहीं। यदि पहले दिन मंत्र नया है और पांच माला या ग्यारह माला जपी है, तो आगे उससे कम नहीं होनी चाहिए। संख्या बढ़ाई जा सकती है, घटाई नहीं जा सकती।
श्मशान साधना की तैयारी
पितृदोष, कुलदेवी दोष की शांति, श्मशान की खतरनाक साधनाएं या एकांत की साधनाएं करने से पहले दो या तीन महीने तक लगातार सूर्यास्त के बाद श्मशान में एक घंटा बैठने का अभ्यास करना चाहिए। वहां की अनुभूति लेकर शांति से वापस आएं। ऐसा करते-करते श्मशान का डर समाप्त हो जाता है। अन्यथा अपने बाल या वस्त्र के हिलने से, या अपने ही दांतों की आवाज से भी डर लग सकता है। श्मशान की तामसिक साधना में कभी पीछे मुड़कर न देखें। पीछे से कोई आवाज, धुन, स्वर या गीत सुनाई दे तो उस पर ध्यान न दें।
साधना में आने वाले अनुभव: माया की परीक्षा
शिष्य को पहले से बता देना चाहिए कि साधना में कुछ अनुभव हो सकते हैं, ताकि वह घबराए नहीं। कंधा भारी हो जाना, सिर पर कोई बैठा हुआ महसूस होना, गोल घेरे के भीतर भी ऐसा अनुभव होना, यह सब साधना की माया है। नदी के सामने साधना करते समय नदी में तूफान आना, बाढ़ का पानी बढ़ना, नदी के जानवर या शैतान दिखना, यह भी माया है। शव साधना में कभी-कभी सब कुछ अपने आप जागृत होता दिखता है, इससे डरना नहीं है। कभी शक्तियां उठाकर पटकती हैं, बुरे सपने आते हैं, आते-जाते रास्तों में डरावने दृश्य दिखते हैं। कभी अपने परिजनों के चीखने, बीमार होने या मर जाने का दृश्य दिखता है, या कोई आत्मा धमकी देती है कि आपका अमुक व्यक्ति मर जाएगा। कभी ऐसा भी लगता है कि बुद्धि क्षीण हो रही है और कहीं हम पागल तो नहीं हो गए। गुरु का उपदेश है कि यह सब माया है और परीक्षा है। इन सब से डरना नहीं है, लंबी सांस लेते रहना है और भैरव मंत्र का जप जारी रखना है।
वचन और शक्ति के सामने आने पर
साधक शक्ति से तीन वचन लेता है: जब मैं बुलाऊं तब आपको आना पड़ेगा, जो मैं कहूं वह आपको करना पड़ेगा, और मुझसे बिना पूछे आप कोई कार्य नहीं करेंगी। बदले में शक्ति भी साधक से एक वचन लेती है। साधक को वही वचन देना चाहिए जिसे वह जीवन भर निभा सके और जिसका उससे गलती से भी उल्लंघन न हो, क्योंकि शक्ति का वचन तोड़ने पर नुकसान होता है। जो वचन निभा न सकें, उसके बदले दूसरा वचन मांगने के लिए शक्ति से कहा जा सकता है, इसमें कोई दिक्कत नहीं।
ध्यान रहे कि जब शक्ति सामने आती है तो वर मांगने की बुद्धि क्षीण हो जाती है। इसलिए जब भी शक्ति सामने आए, लंबी-लंबी सांस खींचते रहें और मन ही मन काल भैरव का ध्यान करते रहें। इससे बुद्धि खुलती है, शक्ति वापस आती है और साधक अपनी मनचाही कामना मांग सकता है। यही कारण है कि पहले किसी सात्विक साधना, जैसे भैरव या कालिका साधना, का नाम लेकर संभावित साधना पूर्ण करने की सलाह दी जाती है।
साधना के लिए पूर्ण समर्पण
बहुत से लोग यह सोचते हैं कि साधना भी चलती रहे और नौकरी, व्यापार जैसे सभी सांसारिक काम भी पहले की तरह होते रहें। अनुभव यह है कि ऐसा संभव नहीं हो पाता। साधना आधे मन से या बचे हुए समय में सिद्ध नहीं होती। इसलिए शिष्य को स्पष्ट बता देना चाहिए कि यदि वह साधना कर रहा है, तो तन, मन और धन, तीनों पूरी तरह लगाकर साधना को साधे, अर्थात उसे सिद्ध करके ही छोड़े। जिसका मन बार-बार नौकरी और व्यापार की चिंता में बंटा रहेगा, उसकी साधना में वह एकाग्रता नहीं आएगी जो सिद्धि के लिए चाहिए।
भीतर का श्मशान और साधक की अपनी साधना
साधना का अनुभव यह भी सिखाता है कि बाहर के श्मशान से बड़ा एक श्मशान साधक के भीतर होता है। जब साधक अपने अंदर के काम, क्रोध, मोह, लोभ और ईर्ष्या को जलाकर समाप्त कर देता है, तब उसका अपना शरीर ही श्मशान के तुल्य हो जाता है। जिस स्थान पर सब कुछ जलकर शांत हो चुका हो, वहां डर का कोई कारण नहीं रहता। इसलिए शिष्य को समझाना चाहिए कि बाहर के श्मशान में जाने का अभ्यास जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक भीतर के विकारों को जलाने का अभ्यास भी है। जिसने भीतर का श्मशान साध लिया, उसके लिए बाहर का श्मशान केवल एक स्थान रह जाता है।
इसी अनुभव से यह बात भी निकलती है कि साधना में साधक अपना देवता स्वयं तय करता है, अपना मंत्र स्वयं बनाता है और अपनी उपासना की पद्धति भी स्वयं रचता है। जब साधना भीतर उतरती है, तब किसी बाहरी ढांचे से अधिक महत्व साधक की अपनी श्रद्धा, अपने भाव और अपनी अनुभूति का हो जाता है। शिष्य को यह बताना चाहिए कि गुरु मार्ग दिखाते हैं, पर अंतिम रूप से साधक को अपने इष्ट, अपने मंत्र और अपनी उपासना के साथ स्वयं जुड़ना पड़ता है। जो साधना साधक के अपने भाव से निकली हो, वही उसके भीतर सबसे गहरी जड़ पकड़ती है।
गुरु का मत और सावधानियां
ध्यान यह भी रखें कि लंबे समय तक नींद की कमी, अकेलापन, उपवास और रात्रि जागरण से शरीर और मन पर वास्तविक असर पड़ता है, और इससे भ्रम तथा डरावने दृश्य भी दिख सकते हैं। इसलिए साधना के साथ यथासंभव भोजन और विश्राम का क्रम बनाए रखें। यदि आपको हफ्तों तक लगातार भय, बेचैनी, नींद न आना या असामान्य व्यवहार हो, तो साधना रोककर गुरु से बात करनी चाहिए और आवश्यकता हो तो चिकित्सक से भी मिलना चाहिए। मन को संभालना भी साधना का ही हिस्सा है।
श्मशान जाते समय शुरुआत में अकेले न जाएं, किसी को सूचना दें, टॉर्च और पानी साथ रखें, और स्थानीय व्यवस्था के नियमों का पालन करें। जहां जाना अनुमत न हो वहां न जाएं। नदी किनारे बाढ़ का वास्तविक खतरा भी हो सकता है, इसलिए मौसम देखकर ही बैठें। दीपक और मोमबत्ती के पास ज्वलनशील वस्त्र या सामग्री न रखें। नियमितता सबसे बड़ी कुंजी है: बड़े अनुष्ठान से अधिक असर रोज के छोटे, अनुशासित जप का होता है।
अंत में मैं इतना ही कहूंगा की हर एक युग में हर एक समय में साधन नहीं सफलता प्रदान की है तो आप अगर सच्चे हृदय से साधना करेंगे तो आप भी एक दिन अवश्य सफल होंगे
-- सूर्यकान्त द्विवेदी
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