पारंपरिक शाबर तंत्र एवं गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित, प्रत्यक्ष गणपति सिद्धि हेतु 40 दिवसीय अनुष्ठान की संपूर्ण, प्रामाणिक एवं चरणबद्ध विधि:
जप-स्थली:- एक पूर्णतः एकांत कक्ष, जहाँ किसी अन्य व्यक्ति का आना-जाना या व्यवधान न हो।
समय:- नित्य रात्रि 10:00 बजे के उपरांत ही जप प्रारंभ करें।
नियम:- साधना कक्ष से बाहर आते समय कक्ष के द्वार पर ताला लगाकर रखें ताकि किसी अन्य की ऊर्जा या प्रवेश से साधना खंडित न हो।
पुष्प व पत्र:- ताजे गेंदे व गुलाब के पुष्प, हरी दूर्वा।
तिलक व पूजन द्रव्य:- लाल चन्दन, सिन्दूर, केसर, जनेऊ, शहद, बताशे, गुलाल, अबीर, शुद्ध चन्दन, सुगन्धित इत्र।
धूप व दीप:- शुद्ध घी का दीपक, तेल का दीपक, धूप बत्तीसा तथा गुग्गल धूप बत्ती।
नैवेद्य:- 11 बूंदी के लड्डू (नित्य भोग हेतु)।
माला व वस्त्र:- लाल चन्दन अथवा रुद्राक्ष की जप माला, धारण करने हेतु लाल पीताम्बर (वस्त्र) और बैठने के लिए लाल आसन।
"ॐ नमो आदेश गुरु कुं गणपाति गणपति बासे मशान जे फल चिन्तु ते फल आन पांच लाडु शिर सिंदूर गणपाति ले चले और कपूर मंत्र जाणे गोरखपति राह वाह पेचकल्ल्या पेतपले पच्छतल्वाड़ी मले सहर में ल्यावणा; गाव की की आन मेरे हाथ लगावे गुरु की शक्ति मेरी भक्ति फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।"
आरंभ दिन व अवधि:- किसी भी मास के शुभ शुक्ल पक्षीय बुधवार से यह साधना प्रारंभ की जाती है और लगातार 40 दिनों तक चलती है।
मूर्ति अभिषेक व शृंगार:-
सर्वप्रथम भगवान गणेश की प्रतिमा को शुद्ध जल, कच्चा दूध, शहद आदि (पंचामृत) से यथाविधि स्नान कराएं। तत्पश्चात पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर वस्त्र, सिन्दूर और इत्र अर्पित करें। गेंदे-गुलाब के पुष्प और दूर्वा चढ़ाएं।
दीप प्रज्वलन:-
घी और तेल के दोनों दीपकों को जोत प्रज्वलित करने के मंत्र द्वारा जलाएं। दोनों दीपकों को जमीन से कम से कम एक फुट ऊपर किसी पाटे या वेदी पर स्थापित करें। गुग्गल व धूप बत्ती प्रज्वलित करें।
नैवेद्य अर्पण:- भगवान गणेश को नित्य 11 बूंदी के लड्डू और बताशों का भोग अर्पित करें।
रक्षा विधान:- जप शुरू करने से पूर्व स्वयं के चारों ओर रक्षा कवच का पाठ कर रक्षा घेरा बनाएं ताकि साधना काल में विघ्न न आएं।
मंत्र जप संख्या:- लाल आसन पर बैठकर, लाल चन्दन या रुद्राक्ष माला से नित्य ठीक 125 बार मंत्र का स्पष्ट एवं एकाग्रता से जाप करें।
प्रत्यक्षीकरण व वरदान (40वां दिन):-
साधना के अंतिम 40वें दिन मान्यतानुसार भगवान गणपति बालरूप 'गणपत' के रूप में प्रत्यक्ष अनुभूत होते हैं। उस समय भयमुक्त होकर, पूर्ण श्रद्धा से नतमस्तक होकर उनका स्वागत करें और जब वे वर मांगने को कहें, तब अपनी अभीष्ट मनोकामना का वर मांगें।
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